भागलपुर-11 फरवरी का दिन भारतीय इतिहास में विशेष महत्व रखता है। यह दिन हमें उस महान क्रांतिकारी की याद दिलाता है, जिसने अंग्रेजी शासन के अन्याय और शोषण के विरुद्ध सबसे पहले सशक्त आवाज बुलंद की थी। अमर शहीद तिलका मांझी केवल एक जनजातीय वीर योद्धा नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक न्याय, स्वाभिमान और अधिकारों की लड़ाई के अग्रदूत थे। उनकी जयंती श्रद्धा, गर्व और संकल्प के साथ मनाना हम सबका नैतिक कर्तव्य है।तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 को बिहार के सुल्तानगंज स्थित तिलकपुर गांव में हुआ था। उनका वास्तविक नाम ‘जबरा पहाड़िया’ था। वे संथाल समाज से आते थे और बचपन से ही अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस रखते थे। 1770 के भीषण अकाल के समय जब अंग्रेजी हुकूमत जनता की पीड़ा के प्रति संवेदनहीन बनी रही, तब तिलका मांझी ने गरीबों की सहायता के लिए अंग्रेजी खजाने को लूटकर जरूरतमंदों में वितरित किया। इस साहसिक कदम ने उन्हें गरीबों का सच्चा नायक बना दिया।उन्होंने वनवासी समाज को संगठित कर अंग्रेजों और उनके सहयोगी जमींदारों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंका। यह विद्रोह केवल सत्ता के खिलाफ नहीं था, बल्कि अन्यायपूर्ण व्यवस्था के विरुद्ध एक व्यापक सामाजिक आंदोलन था। तिलका मांझी का यह संघर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से कई दशक पहले शुरू हो चुका था। इस दृष्टि से वे भारत के प्रथम जनजातीय क्रांतिकारी माने जाते हैं।तिलका मांझी का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची देशभक्ति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में दिखाई देती है। उन्होंने अपने समाज के हक और सम्मान के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़कर घोड़े से बांधकर घसीटा और अंततः फांसी दे दी, लेकिन उनका साहस और बलिदान अमर हो गया।आज के युवाओं के लिए तिलका मांझी प्रेरणा के जीवंत स्रोत हैं। उनका संगठन कौशल, नेतृत्व क्षमता और अन्याय के विरुद्ध अडिग संघर्ष हमें यह संदेश देता है कि यदि संकल्प मजबूत हो, तो परिवर्तन अवश्य संभव है। हमें उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारना चाहिए और समाज में व्याप्त अन्याय, भेदभाव और शोषण के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।उनकी जयंती के अवसर पर हम सभी उनके अदम्य साहस और बलिदान को शत-शत नमन करते हैं और यह संकल्प लेते हैं कि उनके दिखाए मार्ग पर चलकर एक न्यायपूर्ण, समान और सशक्त समाज के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएंगे। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
