भागलपुर-अमर शहीद तिलका मांझी की जयंती के पावन अवसर पर 11 फरवरी 2026 को मारवाड़ी महाविद्यालय, भागलपुर के इतिहास विभाग द्वारा एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का सफल आयोजन किया गया। सेमिनार का विषय था — “अमर शहीद तिलका मांझी आज़ादी के प्रथम जनजातीय वीर योद्धा। कार्यक्रम का उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम में तिलका मांझी के अद्वितीय योगदान को रेखांकित करना तथा जनजातीय इतिहास के महत्व को विद्यार्थियों के समक्ष प्रस्तुत करना था।कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं राष्ट्रगान के साथ हुआ। इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. प्रभात कुमार ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि तिलका मांझी केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि जनजातीय अस्मिता और संघर्ष के प्रतीक हैं। उन्होंने बताया कि इस सेमिनार का आयोजन विद्यार्थियों को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन अध्यायों से परिचित कराने के लिए किया गया है, जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास में अपेक्षित स्थान नहीं मिल सका। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय आंदोलन की जड़ें 1857 से भी पूर्व जनजातीय क्षेत्रों में पनप चुकी थीं, जिनमें तिलका मांझी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।अध्यक्षीय भाषण में महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. (डॉ.) संजय कुमार झा ने तिलका मांझी के जीवन और उनके साहसिक संघर्षों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे भारत के पहले ऐसे जनजातीय क्रांतिकारी थे, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दी। उन्होंने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि तिलका मांझी का जीवन हमें अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने और समाज के कमजोर वर्गों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास का अध्ययन तभी सार्थक है जब हम उससे सीख लेकर वर्तमान को सशक्त बनाएं।मुख्य वक्ता के रूप में टी.एन.बी. कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. रविशंकर कुमार चौधरी ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि तिलका मांझी को “गरीबों का रॉबिनहुड” कहना बिल्कुल उचित है। उन्होंने कहा कि जहाँ 1857 के विद्रोह को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है, वहीं उससे लगभग 80 वर्ष पूर्व बिहार के जंगलों में एक जनजातीय युवक ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। तिलका मांझी ने न केवल अंग्रेजी शासन का विरोध किया, बल्कि शोषणकारी जमींदारी व्यवस्था के विरुद्ध भी संघर्ष किया।डॉ. चौधरी ने बताया कि तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 को बिहार के सुल्तानगंज स्थित तिलकपुर गांव में एक संथाल परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सुंदरा मुर्मू था और उनका वास्तविक नाम ‘जबरा पहाड़िया’ था। ‘तिलका मांझी’ नाम उन्हें अंग्रेजों द्वारा दिया गया। उन्होंने कहा कि 1770 के भीषण अकाल के दौरान जब अंग्रेजी शासन ने गरीबों की सहायता के बजाय कर वसूली जारी रखी, तब तिलका मांझी ने अंग्रेजी खजाने को लूटकर गरीबों में बांट दिया। इस साहसिक कदम से वे जन-जन के नायक बन गए।उन्होंने आगे बताया कि तिलका मांझी ने वनवासी समाज को संगठित कर अंग्रेजों और उनके समर्थक सामंतों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष छेड़ा। यह आंदोलन आगे चलकर ‘संथाल हुल’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। डॉ. चौधरी ने कहा कि तिलका मांझी ने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता की भावना किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह पूरे देश में व्यापक रूप से विद्यमान थी।साहित्यिक दृष्टिकोण से भी तिलका मांझी का जीवन अत्यंत प्रेरणादायी रहा है। डॉ. चौधरी ने उल्लेख किया कि प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी ने उनके जीवन पर आधारित बांग्ला उपन्यास ‘शालगिरर डाके’ लिखा, वहीं हिंदी साहित्यकार राकेश कुमार सिंह ने ‘हुल पहाड़िया’ में उनके संघर्षों को चित्रित किया है। इससे स्पष्ट होता है कि उनका व्यक्तित्व केवल इतिहास तक सीमित नहीं रहा, बल्कि साहित्य में भी अमर हो गया।कार्यक्रम के दौरान विभिन्न विभागों के प्राध्यापकों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। अंग्रेजी विभाग से डॉ. भवेश कुमार, समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. संगीत कुमार, अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. आशीष कुमार मिश्रा एवं डॉ. श्वेता, मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. सुपेन्द्र कुमार यादव, मैथिली विभागाध्यक्ष डॉ. बिनोद कुमार मंडल, राजनीति विज्ञान के डॉ. संजय कुमार जायसवाल, दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. स्वस्तिका दास तथा सांख्यिकी विभागाध्यक्ष डॉ. विजय कुमार सहित अनेक शिक्षकों की गरिमामयी उपस्थिति रही। सभी ने तिलका मांझी के संघर्ष को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आधारशिला बताया।सेमिनार में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। विद्यार्थियों ने प्रश्नोत्तर सत्र में सक्रिय भागीदारी करते हुए जनजातीय इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर जिज्ञासाएं व्यक्त कीं। छात्र हृषिकेश प्रकाश ने कहा कि यह सेमिनार उनके लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायी रहा। उन्होंने कहा कि इस आयोजन के माध्यम से उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के उन अनछुए पहलुओं को जानने का अवसर मिला, जिनके बारे में सामान्यतः पाठ्यपुस्तकों में विस्तृत जानकारी नहीं मिलती।कार्यक्रम के अंत में इतिहास विभाग के सहायक प्राध्यापक अक्षय रंजन ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने सभी अतिथियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के अकादमिक आयोजन से इतिहास के प्रति नई पीढ़ी में रुचि बढ़ती है और सामाजिक चेतना का विकास होता है।अंततः उपस्थित सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों ने अमर शहीद तिलका मांझी के अदम्य साहस, बलिदान और राष्ट्रभक्ति को नमन करते हुए उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया। यह सेमिनार न केवल एक शैक्षणिक आयोजन रहा, बल्कि जनजातीय गौरव और राष्ट्रीय चेतना का उत्सव भी सिद्ध हुआ।
