जमालपुर (मुंगेर)। जमालपुर नगर परिषद में विकास के नाम पर हो रहे कथित गोरखधंधे, अनियमितताओं और एस्टीमेट घोटाले के आरोपों ने एक बार फिर प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। समाजवादी पार्टी के एक शिष्टमंडल ने सपाध्यक्ष पप्पू यादव के नेतृत्व में प्रमंडलीय आयुक्त प्रेम कुमार मीणा से मुलाकात कर पूरे मामले की उच्चस्तरीय जाँच की माँग की। शिष्टमंडल ने आयुक्त को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपते हुए आरोप लगाया कि जमालपुर नगर परिषद में एक-दो नहीं बल्कि कई स्तरों पर गंभीर अनियमितताएँ व्याप्त हैं, जिनमें पदस्थापित कार्यपालक पदाधिकारी, कर्मचारी और उनके कृपापात्र ठेकेदार शामिल हैं।पप्पू यादव ने कहा कि नगर परिषद में कार्यरत लोगों को शासन-प्रशासन का कोई भय नहीं है। उनका मानना है कि यहाँ सब कुछ ‘मैनेजेबल’ है—यानी नियम, प्रक्रिया और गुणवत्ता सबकुछ कागजों तक सीमित रह गए हैं। परिणामस्वरूप जमालपुर नगर परिषद ‘विकास’ नहीं बल्कि ‘लूट और गोरखधंधे’ का पर्याय बनती जा रही है।
फुटपाथ ढलाई का मामला: प्राक्कलन पर सवाल
सपाध्यक्ष ने अपने ज्ञापन में विशेष रूप से अक्टूबर 2025 में कराए गए एक निर्माण कार्य का उल्लेख किया। उनके अनुसार 212 नंबर रेलवे पुल से लेकर अल्बर्ट रोड चौराहे तक सड़क के किनारे फुटपाथ की ढलाई कराई गई। ढलाई के महज कुछ ही महीनों बाद उस निर्माण की गुणवत्ता की पोल खुलने लगी। दोयम दर्जे के सीमेंट और घटिया सामग्री के इस्तेमाल के कारण फुटपाथ से उड़ती धूल ने आमजन का जीना मुहाल कर दिया है।स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस फुटपाथ को जनता की सुविधा के लिए बनाया गया था, वही आज स्वास्थ्य के लिए खतरा बन गया है। सुबह-शाम पैदल चलने वालों, दुकानदारों और आसपास के निवासियों को धूल-गर्द से भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है। बच्चों और बुजुर्गों में सांस की समस्या बढ़ने लगी है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी आँख मूँदे बैठे हैं।पप्पू यादव का कहना है कि यह निर्माण कार्य प्राक्कलन के अनुरूप कहीं से भी नहीं दिखता। विभाग के भीतर के कई जानकार लोगों का मानना है कि या तो प्राक्कलन के साथ गंभीर छेड़छाड़ की गई या फिर इस कार्य का कोई विधिवत प्राक्कलन तैयार ही नहीं किया गया। यदि प्राक्कलन था तो उसकी प्रमाणित प्रति सार्वजनिक क्यों नहीं की गई—यह सवाल आज भी अनुत्तरित है।
रेलवे क्षेत्र में ढलाई: नियमों की अनदेखी?
ज्ञापन में एक और गंभीर आरोप यह लगाया गया कि निर्माण कार्य के दौरान नगर परिषद जमालपुर द्वारा वार्ड नंबर 16 अंतर्गत वैपटिस्ट चर्च के पीछे स्थित रेलवे सड़क के साथ-साथ अल्बर्ट रोड स्थित रेल क्षेत्र के फुटपाथ की भी ढलाई करवाई गई। यह सीधे तौर पर अधिकार क्षेत्र और स्वीकृति से जुड़ा मामला है। रेलवे की भूमि पर नगर परिषद द्वारा बिना स्पष्ट अनुमति के ढलाई कराना न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह एस्टीमेट घोटाले की ओर भी इशारा करता है।सपाध्यक्ष ने कहा कि यदि यह कार्य रेलवे क्षेत्र में हुआ है तो इसकी अनुमति किससे ली गई, प्राक्कलन किस विभाग ने बनाया और भुगतान किस मद से हुआ—इन सभी बिंदुओं पर स्पष्टता आवश्यक है। यदि इन सवालों के जवाब नहीं दिए जाते तो यह मानने का पूरा आधार बनता है कि कागजों में कुछ और दिखाया गया और ज़मीन पर कुछ और किया गया।
जिला प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
पप्पू यादव ने यह भी कहा कि इस पूरे मामले को लेकर पूर्व में जिला पदाधिकारी को पत्राचार किया गया था, लेकिन उसके बावजूद जिला प्रशासन का मौन कई सवाल खड़े करता है। यदि आरोप निराधार हैं तो उनकी जाँच कर सच्चाई सामने क्यों नहीं लाई गई? और यदि आरोप सही हैं तो दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? प्रशासन की यह चुप्पी जनता के विश्वास को कमजोर कर रही है।स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि नगर परिषद से जुड़े कई मामलों में शिकायतों का यही हश्र होता है—आवेदन दिए जाते हैं, ज्ञापन सौंपे जाते हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर शून्य। इससे यह संदेश जाता है कि नियमों का उल्लंघन करने वालों को संरक्षण प्राप्त है।
सूचना के अधिकार की अनदेखी
मामले को और गंभीर बनाते हुए सपाध्यक्ष ने बताया कि जब उन्होंने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत इस निर्माण कार्य से संबंधित प्राक्कलन की प्रमाणित प्रति माँगी, तो एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद नगर परिषद कार्यालय ने जानकारी उपलब्ध कराना जरूरी नहीं समझा। यह आरटीआई कानून का सीधा उल्लंघन है, जो पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है।आरटीआई का जवाब न देना इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं कुछ छिपाने की कोशिश की जा रही है। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ होता, तो प्राक्कलन और अन्य दस्तावेज सार्वजनिक करने में कोई हिचक क्यों होती? यही प्रश्न शिष्टमंडल ने आयुक्त के समक्ष रखा।
बाहरी परिसर में टाइल्स: विकास या दिखावा?
ज्ञापन में नगर परिषद की कार्यशैली पर एक और उदाहरण देते हुए पप्पू यादव ने कहा कि अब नगर परिषद कार्यालय के उस हिस्से में भी टाइल्स लगवाई जा रही हैं, जिसे आम लोग ‘बाहरी परिसर’ कहते हैं और जहाँ वाहनों का आवागमन होता है। सवाल यह है कि क्या यह प्राथमिकता वाला विकास है? जब शहर की सड़कों, नालियों और सार्वजनिक सुविधाओं की हालत जर्जर है, तब कार्यालय के बाहरी परिसर में टाइल्स लगवाना किस तरह का विकास दर्शाता है?उन्होंने कहा कि जनता के टैक्स के पैसे का उपयोग दिखावटी कार्यों में किया जा रहा है, जबकि बुनियादी समस्याएँ जस की तस बनी हुई हैं। यह न केवल संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि जनता के साथ छल भी है।
‘जीरो टॉलरेंस’ की कसौटी
सपाध्यक्ष पप्पू यादव ने आयुक्त से स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की जो घोषणा की गई है, उसे जमीन पर प्रमाणित किया जाए। जमालपुर नगर परिषद में चल रहे कथित गोरखधंधे और एस्टीमेट घोटाले की निष्पक्ष और समयबद्ध जाँच कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए।उन्होंने चेतावनी दी कि यदि प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया और जाँच में टालमटोल की गई, तो समाजवादी लोग सड़क पर उतरने के लिए बाध्य होंगे। यह आंदोलन लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण होगा, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ी जाएगी।
शिष्टमंडल में ये रहे शामिल
इस अवसर पर लोहिया वाहिनी के प्रदेश महासचिव रविकांत झा, जिला महासचिव मिथिलेश यादव, मो. आज़म, मनोज क्रांति सहित कई अन्य समाजवादी कार्यकर्ता मौजूद थे। सभी ने एक स्वर में नगर परिषद की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग की।
जनता की अपेक्षाएँ
जमालपुर की जनता अब इस पूरे प्रकरण में प्रशासन की अगली कार्रवाई पर नजरें टिकाए हुए है। लोगों की अपेक्षा है कि आरोपों की निष्पक्ष जाँच हो, दोषियों की पहचान की जाए और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग पर रोक लगे। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह मामला न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है।अंततः सवाल यही है कि क्या जमालपुर नगर परिषद में विकास कार्य वास्तव में जनता के हित में हो रहे हैं या फिर कागजों और कमीशन के खेल में शहर का भविष्य दाँव पर लगाया जा रहा है। इस सवाल का जवाब अब जाँच और प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगा।
